وليد الحسين يكتب: أريدُ أنْ



الحرارةُ  تضرب جسدي وتجلده بقوة دون رحمة ولا أملك الوسائل الكافية لردعها والوقوف بوجهها.. كل الذي أملكه مروحة سقفية بأربع شفرات أكلها الصدأ.. 
لم يعدْ لدي الكثير لأكتبه.. 
أهرش.. 
أدغدغ.. 
أقبل.. 
ومن ثم أضاجعُ مخيلتي علّها تحبل بمولودٍ جميل يحملني في آخر الزمان.. ولكن عبثاً  كلُّ محاولاتي بائت بالفشل.. 
مخيلة محنية الظهر بلا أسنان وطاعنة في السن كيف لها أن تحبل وتنجب..؟ 
لم أعد أريد شيئاً.. 
كل الذي أريده ذهناً صافياً..
أريد أن أخاطب الله بذهنٍ صاف.. 
أريد أن أكتب.. 
أقرأ.. 
أرسم.. 
أغني.. 
أرقص.. 
وأحلم بذهن صاف.. 
أريد أن أقول لإبني البكر أووو لقد أصبحت شاباً.. 
أريد أن أقول لإبنتي سلمى.. 
يااارباه لقد أصبح شعرك طويلاً.. 
طويلاً ك ياسمينة تشق قاسيون نصفين.. 
أريد أن أقول لإبني الصغير.. ذاك المشاكس.. أحبك 
أريد أن أقول لزوجتي أعشقك وأعشق الهواء من حولك.. 
أريد أن أقول لأبي وأمي سامحكم الله.. 
أريد أن أقول لكل الذين خذلوني تباً لكم.. 
أريد.. 
أريد أن أتبول وأتغوط وأستحم.. 
أريد أن أنام وأصحو.. 
أريد.. 
أن أضحك..
أركض مهرولاً باتجاه الشمس.. 
أمارس هوايتي وهي كرة القدم.. 
يالله.. 
كل هذا أريد قوله بذهن صاف فقط.. 
أريد أن أبكي.. 
يالله.. 
كل هذا الذي قرأتموه الآن كتبته و أنا نائم..

عن دعوة للتفكير

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